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ख़ुद से नाराज़गी

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खुद से नाराज़गी औऱ दुनिया से रूठे रहना, क्यों ये बंदिशें अपने आप पर लगा रहे हो। कसमें, रस्में, उसूल,फिर भी कर रहे भूल, पुराने निभा नहीं पाए,नए रिवाज बना रहे हो। मुसीबतें पाल बैठे,चंद दौलत आते ही, कभी सोचकर देखो,क्या सुकून पा रहे हो। कोशिशें अधूरी,कोई तो आखिर बात हो पूरी, रोज़ की दिनचर्या आख़िर कहाँ बिता रहे हो।

covid 19

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न हिन्दू शामिल है इसमें,न मुस्लिम का हाथ है, सिख,ईसाई,बौद्ध, जैन सब यहां साथ है। फर्क सिर्फ इतना पता है कुछ की ही ये ख़ता है। हालात बदतर थे न ठीक होने के कगार पर थे, मन्नतें थीं मंदिरों में,दुआओं में कुछ मजार पर थे। शुक्र मना ऐ इंसान तुझे जिंदगी दूसरी मिली है, हां मगर ये भी मान ये तेरी बुज़दिली है। हौंसला उनका क़ाबिले-तारीफ़,जो जद्दोजहद में रहे,  छोड़कर परिवार अपना सिर्फ हद में रहे। अब भी वक़्त बाकी है दुनिया को बदलने का, बस ये वक्त तो है, हां मगर वादा कर साथ चलने का। रिवाज कुछ पुराना साथ ले,इरादे अपने नेक कर ले, हां,बशर्ते काम अच्छा हो,चाहे एक कर ले।

पास आने की कोशिशें

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पास आने की कोशिशें जारी रख, यूं इस तरह मुझे खुद से दूर न कर। चाहते बेशुमार की हैं पूछ अपने दिल से कभी, टूट तो चुकी हूं और चूर चूर न कर। हां प्यार का कुछ हिस्सा ही कुबूल है हमें, वो भी चाहे भरपूर न कर। अरे इतना भी जज्बाती नहीं हम, ये नासमझी तो हुजूर न कर।

दरीचे से

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जरा सी रोशनी आती है दरीचे से, अक्सर जब हम तन्हा होते हैं दोपहर में कभी। एक उम्मीद तेरे आने की आज भी बरकरार है, जरा आ कभी पीने चाय हमारे शहर में कभी।

रूबरू

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वक्त होगा तो होंगे कभी रूबरू, अभी कोई वजह नहीं है। फुर्सत में मिलेंगे रेस्तरां में कहीं, घर छोटा है हमारा इतनी जगह नहीं है।

आगाज तो कर

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Open for read निकल बाहर आशियाने से,तूं आगाज तो कर, धीरे बोल कुछ तो सही,तूं आवाज़ तो कर। सुना है खुशमिजाज है जिंदगी में तूं, कभी रूठकर, टूटकर, यह भी अंदाज तो कर। डरकर जीना भी कोई जिंदगी की मिसाल नहीं, पानी में डूबकर निकल,ख़ुद को जांबाज तो कर। वक्त को वक्त मिला, तुझे भी देगा मोहलत कभी, वक्त के पहिये सा, पहले मिज़ाज तो कर। तुझे तोड़ा जाएगा,पुराने मकान की तरह, उसी पुरानी ईंट से जुड़कर नया रिवाज तो कर। कल करने की सोच रहा है जिस काम को तूं, क्यों न उसे...... क्यों न उसे,अभी और आज तूं कर।