मिट्टी की सौंधी सी खुशबू


इश्क़ को मुक्कमल न कर महबूब मेरे,
मुझे हर पल हर लम्हा तरसने दे।

कि मिट्टी की सौंधी खुशबू बाकी है अभी,
ए-ख़ुदा ज़रा औऱ बरसने दे।

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