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Showing posts from April, 2021

मिट्टी की सौंधी सी खुशबू

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इश्क़ को मुक्कमल न कर महबूब मेरे, मुझे हर पल हर लम्हा तरसने दे। कि मिट्टी की सौंधी खुशबू बाकी है अभी, ए-ख़ुदा ज़रा औऱ बरसने दे।

ख़ुद से नाराज़गी

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खुद से नाराज़गी औऱ दुनिया से रूठे रहना, क्यों ये बंदिशें अपने आप पर लगा रहे हो। कसमें, रस्में, उसूल,फिर भी कर रहे भूल, पुराने निभा नहीं पाए,नए रिवाज बना रहे हो। मुसीबतें पाल बैठे,चंद दौलत आते ही, कभी सोचकर देखो,क्या सुकून पा रहे हो। कोशिशें अधूरी,कोई तो आखिर बात हो पूरी, रोज़ की दिनचर्या आख़िर कहाँ बिता रहे हो।

covid 19

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न हिन्दू शामिल है इसमें,न मुस्लिम का हाथ है, सिख,ईसाई,बौद्ध, जैन सब यहां साथ है। फर्क सिर्फ इतना पता है कुछ की ही ये ख़ता है। हालात बदतर थे न ठीक होने के कगार पर थे, मन्नतें थीं मंदिरों में,दुआओं में कुछ मजार पर थे। शुक्र मना ऐ इंसान तुझे जिंदगी दूसरी मिली है, हां मगर ये भी मान ये तेरी बुज़दिली है। हौंसला उनका क़ाबिले-तारीफ़,जो जद्दोजहद में रहे,  छोड़कर परिवार अपना सिर्फ हद में रहे। अब भी वक़्त बाकी है दुनिया को बदलने का, बस ये वक्त तो है, हां मगर वादा कर साथ चलने का। रिवाज कुछ पुराना साथ ले,इरादे अपने नेक कर ले, हां,बशर्ते काम अच्छा हो,चाहे एक कर ले।