आज यूं ही बैठे थे उस दरख़्त की छांव में, कुछ पत्ते उड़कर आ गए पाँव में। तब जाकर पता लगा वो भी किसी से जुड़े थे, किसी अपने की तलाश में फिर हवा में उड़े थे। एक खोने का गम,जो है वो भी लगे कम, न जाने क्यों इसी कश्मकश में उलझे से हैं हम।
शीशे सी तासीर मत बना,पत्थर की तरह भी पेश आ ज़रा। नदियों सा बहता चल,वक़्त आने पर समंदर सा होगा भरा। कौन कहता है जमीं बंजर है यहां, कभी तो था यहां भी खेत हरा। तालीम कुछ बुरा वक्त भी देता है, यूं ही नही बनता कोई हीरे सा खरा।
खुबसूरत बचपन याद आता है, क्यों न कुछ मनमर्जी हो जाए। मिल जाए उस दौर में जाने का रास्ता, कुछ खुदा से यूं अर्जी हो जाए। एहसास उम्र का न हो एक पल के लिए, दौलत शोहरत हर चीज हमारे लिए फर्जी हो जाए।