दरीचे से


जरा सी रोशनी आती है दरीचे से,
अक्सर जब हम तन्हा होते हैं दोपहर में कभी।
एक उम्मीद तेरे आने की आज भी बरकरार है,
जरा आ कभी पीने चाय हमारे शहर में कभी।

Comments

Popular posts from this blog

रूबरू

My thoughts

दरख़्त