ख़ुद से नाराज़गी
खुद से नाराज़गी औऱ दुनिया से रूठे रहना,
क्यों ये बंदिशें अपने आप पर लगा रहे हो।
कसमें, रस्में, उसूल,फिर भी कर रहे भूल,
पुराने निभा नहीं पाए,नए रिवाज बना रहे हो।
मुसीबतें पाल बैठे,चंद दौलत आते ही,
कभी सोचकर देखो,क्या सुकून पा रहे हो।
कोशिशें अधूरी,कोई तो आखिर बात हो पूरी,
रोज़ की दिनचर्या आख़िर कहाँ बिता रहे हो।
Comments
Post a Comment