दरख़्त

आज यूं ही बैठे थे उस दरख़्त की छांव में,
कुछ पत्ते उड़कर आ गए पाँव में।
तब जाकर पता लगा वो भी किसी से जुड़े थे,
किसी अपने की तलाश में फिर हवा में उड़े थे।
एक खोने का गम,जो है वो भी लगे कम,
न जाने क्यों इसी कश्मकश में उलझे से हैं हम।

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